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ramayan 4.30.16: आर्य! काम के वशीभूत होकर अपने पुरुषत्व का तिरस्कार करने और अपनी वीरता को भूल जाने से क्या लाभ? यह लज्जाजनक शोक तुम्हारे मन की एकाग्रता को नष्ट कर रहा है। क्या इस समय योग का आश्रय लेकर और मन को एकाग्र करके यह सारी चिंता दूर नहीं हो सकती?॥16॥   |   ramayan सर्ग 4.30: शरद्-ऋतु का वर्णन तथा श्रीराम का लक्ष्मण को सुग्रीव के पास जाने का आदेश देना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 30: शरद्-ऋतु का वर्णन तथा श्रीराम का लक्ष्मण को सुग्रीव के पास जाने का आदेश देना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  4.30.16 
किमार्य कामस्य वशंगतेन
किमात्मपौरुष्यपराभवेन ।
अयं ह्रिया संह्रियते समाधि:
किमत्र योगेन निवर्तते न॥ १६॥
 
 
अनुवाद
आर्य! काम के वशीभूत होकर अपने पुरुषत्व का तिरस्कार करने और अपनी वीरता को भूल जाने से क्या लाभ? यह लज्जाजनक शोक तुम्हारे मन की एकाग्रता को नष्ट कर रहा है। क्या इस समय योग का आश्रय लेकर और मन को एकाग्र करके यह सारी चिंता दूर नहीं हो सकती?॥16॥
 
‘Arya! What is the benefit of being overcome by lust and thus despising your manhood and forgetting your valour? This shameful grief is destroying the concentration of your mind. Can't all this worry be removed by taking recourse to yoga and concentrating your mind at this time?॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)