श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 3: हनुमान जी का श्रीराम और लक्ष्मण से वन में आने का कारण पूछना और अपना तथा सुग्रीव का परिचय देना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.3.30 
न मुखे नेत्रयोश्चापि ललाटे च भ्रुवोस्तथा।
अन्येष्वपि च सर्वेषु दोष: संविदित: क्वचित्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
‘कहीं भी ऐसा ज्ञात नहीं है कि बातचीत के दौरान उनके मुख, नेत्र, ललाट, भौंहों अथवा शरीर के किसी अन्य अंग में कोई दोष प्रकट हुआ हो ॥30॥
 
‘It is not known anywhere that during the conversation any defect appeared in his face, eyes, forehead, eyebrows or any other body part.॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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