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श्लोक 4.28.58  |
अहं तु हृतदारश्च राज्याच्च महतश्च्युत:।
नदीकूलमिव क्लिन्नमवसीदामि लक्ष्मण॥ ५८॥ |
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| अनुवाद |
| परन्तु लक्ष्मण! मैंने न केवल अपना महान राज्य खो दिया है, अपितु मेरी पत्नी का भी हरण हो गया है; अतः मैं जल में डूबी हुई नदी के तट के समान दुःख भोग रहा हूँ। |
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| But Lakshmana! I have not only lost my great kingdom, but my wife has also been abducted; therefore I am suffering like the banks of a river submerged in water. |
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