श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  4.28.51 
सुरतामर्दविच्छिन्ना: स्वर्गस्त्रीहारमौक्तिका:।
पतन्ति चातुला दिक्षु तोयधारा: समन्तत:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
सुरत की क्रीड़ा करते समय शरीर के प्रवाह से खंडित हुई दिव्य अप्सराओं के मोतियों के हारों के समान शान्त जल की धाराएँ सब दिशाओं में गिर रही हैं॥ 51॥
 
Peaceful streams of water, resembling the pearl necklaces of celestial nymphs broken by the flow of their bodies during the play of Surat, are falling in all directions.॥ 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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