श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  4.28.43 
मत्ता गजेन्द्रा मुदिता गवेन्द्रा
वनेषु विक्रान्ततरा मृगेन्द्रा:।
रम्या नगेन्द्रा: निभृता नरेन्द्रा:
प्रक्रीडितो वारिधरै: सुरेन्द्र:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
‘गजेन्द्र (हाथी) उन्मत्त हो रहे हैं, गवेन्द्र (बैल) आनन्द में मग्न हैं, मृगेन्द्र (सिंह) वन में महान पराक्रम दिखा रहे हैं, नागेन्द्र (विशाल पर्वत) शोभायमान हो रहे हैं, नरेन्द्र (राजा) युद्ध का उत्साह त्यागकर मौन हैं और सुरेन्द्र (भगवान् इन्द्र) जलधारियों के साथ क्रीड़ा कर रहे हैं॥ 43॥
 
‘The Gajendras (elephants) are going crazy, the Gavendras (bulls) are immersed in joy, the Mrigendras (lions) are displaying great valour in the forests, the Nagendras (huge mountains) look beautiful, the Narendras (kings) are silent – ​​they have given up the excitement of war and the Surendras (Lord Indra) is playing with the water bearers.॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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