श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  4.28.35 
मुक्तासमाभं सलिलं पतद् वै
सुनिर्मलं पत्रपुटेषु लग्नम्।
हृष्टा विवर्णच्छदना विहंगा:
सुरेन्द्रदत्तं तृषिता: पिबन्ति॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
प्यासे पक्षी आकाश से मोतियों के समान गिरते हुए और पत्तों के दोनों ओर एकत्रित जल को देखकर बड़े हर्ष से देवराज इन्द्र के द्वारा दिए गए जल को पीते हैं। वर्षा में भीगने के कारण उनके पंख नाना प्रकार के रंग के दिखाई देते हैं॥ 35॥
 
‘The thirsty birds, seeing the water falling from the sky like pearls and collected on both sides of the leaves, drink the water given by the king of gods Indra with great joy. Due to being wet in the rain, their wings appear of various colours.॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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