श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.28.33 
क्वचित् प्रगीता इव षट्पदौघै:
क्वचित् प्रनृत्ता इव नीलकण्ठै:।
क्वचित् प्रमत्ता इव वारणेन्द्रै-
र्विभान्त्यनेकाश्रयिणो वनान्ता:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
कहीं भौंरों के झुंड गा रहे हैं, कहीं मोर नाच रहे हैं और कहीं हाथी मतवाले होकर विचरण कर रहे हैं। इस प्रकार ये वन प्रदेश अनेक भावों के आश्रय बनकर शोभायमान हो रहे हैं॥ 33॥
 
Somewhere flocks of bumblebees are singing, somewhere peacocks are dancing and somewhere elephants are roaming around in a drunken state. In this way these forest regions are becoming beautiful by becoming the shelter of many emotions.॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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