श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  4.28.20 
विद्युत्पताका: सबलाकमाला:
शैलेन्द्रकूटाकृतिसंनिकाशा:।
गर्जन्ति मेघा: समुदीर्णनादा
मत्ता गजेन्द्रा इव संयुगस्था:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जैसे युद्धस्थल में खड़े हुए मतवाले हाथी जोर-जोर से गर्जना कर रहे हैं, उसी प्रकार पर्वत शिखरों के समान बादल जोर-जोर से गर्जना कर रहे हैं। मेघरूपी इन हाथियों पर चमकती हुई बिजली झण्डों के समान फहरा रही है और बगुलों की पंक्तियाँ माला के समान शोभा पा रही हैं॥ 20॥
 
‘Just as the drunken elephants standing on the battlefield roar loudly, similarly the clouds resembling the peaks of the mountain are roaring loudly. The flashing lightning is fluttering like flags on these elephants in the form of clouds and the rows of herons look beautiful like a garland.॥ 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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