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श्लोक 4.28.12  |
नीलमेघाश्रिता विद्युत् स्फुरन्ती प्रतिभाति मे।
स्फुरन्ती रावणस्याङ्के वैदेहीव तपस्विनी॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| यह बिजली नीले बादल का आश्रय लेकर चमकती हुई मुझे रावण के चंगुल में जूझती हुई तपस्वी सीता के समान प्रतीत हो रही है॥12॥ |
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| This lightning, taking shelter of the blue cloud and appearing bright, appears to me like the ascetic Sita struggling in the clutches of Ravana.॥ 12॥ |
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