श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.28.11 
कशाभिरिव हैमीभिर्विद्युद्भिरभिताडितम्।
अन्त:स्तनितनिर्घोषं सवेदनमिवाम्बरम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
ये बिजली के कड़के सोने के चाबुक के समान प्रतीत होते हैं। आकाश उनके प्रहार से व्याकुल होकर अपने भीतर प्रकट हुए बादलों की गम्भीर गर्जना के रूप में विलाप कर रहा है॥11॥
 
‘These lightning bolts appear like whips made of gold. The sky seems to be distressed by their blows and is wailing in the form of the deep roar of the clouds expressed within it.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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