श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 27: प्रस्रवणगिरि पर श्रीराम और लक्ष्मण की परस्पर बातचीत  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  4.27.40 
अहं तु खलु ते वीर्यं प्रसुप्तं प्रतिबोधये।
दीप्तैराहुतिभि: काले भस्मच्छन्नमिवानलम्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
जैसे हवनकाल में राख में छिपी हुई अग्नि आहुतियों से प्रज्वलित हो जाती है, वैसे ही मैं तुम्हारे सोए हुए पराक्रम को जगा रहा हूँ - तुम्हें तुम्हारे भूले हुए बल और पराक्रम का स्मरण करा रहा हूँ॥40॥
 
‘Just as the fire hidden in the ashes is lit up with the offerings during the havan time, similarly I am awakening your sleeping prowess – reminding you of your forgotten strength and valour.’॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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