श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 27: प्रस्रवणगिरि पर श्रीराम और लक्ष्मण की परस्पर बातचीत  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.27.28 
लब्ध्वा भार्यां कपिवर: प्राप्य राज्यं सुहृद्‍वृत:।
ध्रुवं नन्दति सुग्रीव: सम्प्राप्य महतीं श्रियम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
निश्चय ही वानरों में श्रेष्ठ सुग्रीव अपनी पत्नी को पाकर, राज्य को प्राप्त करके और बहुत-सा धन पाकर अपने मित्रों के साथ आनन्द मना रहा है। ॥28॥
 
Surely, the best of the apes, Sugreeva, having regained his wife, having taken possession of the kingdom and having acquired possession of a large quantity of wealth, is rejoicing with his friends.' ॥28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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