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श्लोक 4.27.24  |
पश्य चन्दनवृक्षाणां पङ्क्ति: सुरुचिरा इव।
ककुभानां च दृश्यन्ते मनसैवोदिता: समम्॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| वहाँ देखो, अर्जुन और चंदन के वृक्षों की पंक्तियाँ कितनी सुन्दर लग रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो वे मन के विचार मात्र से ही प्रकट हो गए हों॥ 24॥ |
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| ‘Look there, how beautiful the rows of Arjun and Sandalwood trees look. It seems as if they have appeared just by the thought of the mind.॥ 24॥ |
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