श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 27: प्रस्रवणगिरि पर श्रीराम और लक्ष्मण की परस्पर बातचीत  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  4.27.21 
पुलिनैरतिरम्यैश्च हंससारससेविता।
प्रहसन्त्येव भात्येषा नानारत्नसमन्विता॥ २१॥
 
 
अनुवाद
अत्यन्त सुन्दर तटों से सुशोभित, नाना प्रकार के रत्नों से युक्त तथा हंसों और सारसों से सेवित यह नदी अपनी विनोदप्रियता फैलाती हुई प्रतीत होती है ॥ 21॥
 
Adorned with very beautiful banks, filled with various kinds of gems and served by swans and cranes, this river seems to be spreading its humor. ॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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