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ramayan 4.25.6: काल भी काल (अपनी व्यवस्था) का उल्लंघन नहीं कर सकता। वह काल कभी क्षीण नहीं होता। स्वभाव (नियति) को प्राप्त होने पर कोई भी उसका उल्लंघन नहीं करता।॥6॥   |   ramayan सर्ग 4.25: श्रीराम का सुग्रीव, तारा और अङ्गद को समझाना तथा वाली के दाह-संस्कार के लिये आज्ञा प्रदान करना,अङ्गद के द्वारा उसका दाह-संस्कार कराना और उसे जलाञ्जलि देना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 25: श्रीराम का सुग्रीव, तारा और अङ्गद को समझाना तथा वाली के दाह-संस्कार के लिये आज्ञा प्रदान करना,अङ्गद के द्वारा उसका दाह-संस्कार कराना और उसे जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.25.6 
न काल: कालमत्येति न काल: परिहीयते।
स्वभावं च समासाद्य न कश्चिदतिवर्तते॥ ६॥
 
 
अनुवाद
काल भी काल (अपनी व्यवस्था) का उल्लंघन नहीं कर सकता। वह काल कभी क्षीण नहीं होता। स्वभाव (नियति) को प्राप्त होने पर कोई भी उसका उल्लंघन नहीं करता।॥6॥
 
‘Even time cannot violate time (its own arrangement). That time never diminishes. After attaining the nature (destiny), no one violates it.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)