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ramayan 4.25.42: हे प्राणवल्लभ! प्राणों का नाश होने पर भी आपका मुखमंडल अस्त होते हुए सूर्य के समान सजीव तथा प्रसन्न एवं आभायुक्त प्रतीत होता है। 42॥   |   ramayan सर्ग 4.25: श्रीराम का सुग्रीव, तारा और अङ्गद को समझाना तथा वाली के दाह-संस्कार के लिये आज्ञा प्रदान करना,अङ्गद के द्वारा उसका दाह-संस्कार कराना और उसे जलाञ्जलि देना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 25: श्रीराम का सुग्रीव, तारा और अङ्गद को समझाना तथा वाली के दाह-संस्कार के लिये आज्ञा प्रदान करना,अङ्गद के द्वारा उसका दाह-संस्कार कराना और उसे जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  4.25.42 
प्रहृष्टमिह ते वक्त्रं गतासोरपि मानद।
अस्तार्कसमवर्णं च दृश्यते जीवतो यथा॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
हे प्राणवल्लभ! प्राणों का नाश होने पर भी आपका मुखमंडल अस्त होते हुए सूर्य के समान सजीव तथा प्रसन्न एवं आभायुक्त प्रतीत होता है। 42॥
 
‘Pranvallabh, who gives respect to others! Even after the loss of life, your face appears to be alive and remains happy and full of aura like the setting sun. 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)