श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 23: तारा का विलाप  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.23.28 
या दत्ता देवराजेन तव तुष्टेन संयुगे।
शातकौम्भीं प्रियां मालां तां ते पश्यामि नेह किम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
मैं अब तुम्हारे गले में वह बहुमूल्य स्वर्ण हार क्यों नहीं देख रहा हूँ, जो युद्ध में प्रसन्न होकर देवताओं के राजा इन्द्र ने तुम्हें दिया था?॥ 28॥
 
Why don't I see around your neck now the precious golden necklace that the king of gods Indra gave you after being pleased with you in the war?॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)