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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड
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सर्ग 23: तारा का विलाप
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श्लोक 2
श्लोक
4.23.2
शेषे त्वं विषमे दु:खमकृत्वा वचनं मम।
उपलोपचिते वीर सुदु:खे वसुधातले॥ २॥
अनुवाद
"वीर! दुःख की बात है कि तुमने मेरी बात नहीं मानी और अब तुम पत्थर की बनी हुई अत्यंत कष्टदायक और ऊबड़-खाबड़ सतह पर सो रहे हो॥ 2॥
"Veer! It is sad that you did not listen to me and now you are sleeping on a very painful and uneven surface made of stone.॥ 2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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