श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 22: वाली का सुग्रीव और अङ्गद से अपने मन की बात कहकर प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  4.22.27-28h 
हते प्लवगशार्दूले निष्प्रभा वानरा: कृता:।
यस्य वेगेन महता काननानि वनानि च॥ २७॥
पुष्पौघेणानुबद्‍ध्यन्ते करिष्यति तदद्य क:।
 
 
अनुवाद
‘वानरों में श्रेष्ठ वालि के मर जाने से सभी वानर निराश्रित हो गए हैं। जिनके महातेज (प्रताप) से सम्पूर्ण वन-वन सदैव पुष्पगुच्छों से आच्छादित रहते थे, उनके वियोग में आज ऐसा अद्भुत कार्य कौन करेगा?
 
‘All the monkeys have become destitute after the death of the best of the monkeys, Vali. Who will perform such a miraculous deed today in the absence of the one whose great power (glory) always kept the entire forest and jungle covered with clusters of flowers?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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