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ramayan 4.22.23: किसी से अत्यधिक प्रेम न करो और प्रेम का सर्वथा अभाव भी न होने दो; क्योंकि ये दोनों ही महान दोष हैं। अतः मध्य स्थिति पर ही दृष्टि रखो।॥23॥   |   ramayan सर्ग 4.22: वाली का सुग्रीव और अङ्गद से अपने मन की बात कहकर प्राणों को त्याग देना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 22: वाली का सुग्रीव और अङ्गद से अपने मन की बात कहकर प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.22.23 
न चातिप्रणय: कार्य: कर्तव्योऽप्रणयश्च ते।
उभयं हि महादोषं तस्मादन्तरदृग् भव॥ २३॥
 
 
अनुवाद
किसी से अत्यधिक प्रेम न करो और प्रेम का सर्वथा अभाव भी न होने दो; क्योंकि ये दोनों ही महान दोष हैं। अतः मध्य स्थिति पर ही दृष्टि रखो।॥23॥
 
‘Do not love anyone excessively and do not allow love to be totally absent either; because both of these are great faults. Therefore, keep your eye on the middle position only.'॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)