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श्लोक 4.22.23  |
न चातिप्रणय: कार्य: कर्तव्योऽप्रणयश्च ते।
उभयं हि महादोषं तस्मादन्तरदृग् भव॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| किसी से अत्यधिक प्रेम न करो और प्रेम का सर्वथा अभाव भी न होने दो; क्योंकि ये दोनों ही महान दोष हैं। अतः मध्य स्थिति पर ही दृष्टि रखो।॥23॥ |
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| ‘Do not love anyone excessively and do not allow love to be totally absent either; because both of these are great faults. Therefore, keep your eye on the middle position only.'॥ 23॥ |
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