श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 22: वाली का सुग्रीव और अङ्गद से अपने मन की बात कहकर प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  4.22.20 
देशकालौ भजस्वाद्य क्षममाण: प्रियाप्रिये।
सुखदु:खसह: काले सुग्रीववशगो भव॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'बेटा! अब समय और स्थान को समझो। तय करो कि कब और कहाँ कैसा व्यवहार करना है। जो भी मिले, सुखद हो या अप्रिय, सुख हो या दुःख, समयानुसार सहन करो। हृदय में क्षमा रखो और सदैव सुग्रीव की आज्ञा में रहो।'
 
‘Son! Now understand the time and place. Decide when and where you should behave in a way. Bear whatever comes your way, pleasant or unpleasant, pleasure or pain, as per the time. Keep forgiveness in your heart and always be under the command of Sugreeva.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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