श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 21: हनुमान जी का तारा को समझाना और तारा का पति के अनुगमन का ही निश्चय करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.21.15 
नह्येषा बुद्धिरास्थेया हनूमन्नङ्गदं प्रति।
पिता हि बन्धु: पुत्रस्य न माता हरिसत्तम॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे हनुमान! अंगद के विषय में आपकी सलाह मेरे लिए उपयुक्त नहीं है। आपको यह समझ लेना चाहिए कि पुत्र के सच्चे मित्र (सहायक) उसके पिता और चाचा ही होते हैं, उसकी माता नहीं॥ 15॥
 
O great Hanuman! Your advice regarding Angad is not suitable for me. You should understand that the real friends (helpers) of a son are his father and uncle, not his mother.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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