श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 2: सुग्रीव तथा वानरों की आशङ्का, हनुमान्जी द्वारा उसका निवारण तथा सुग्रीव का हनुमान जी को श्रीराम-लक्ष्मण के पास उनका भेद लेने के लिये भेजना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.2.6 
एतौ वनमिदं दुर्गं वालिप्रणिहितौ ध्रुवम्।
छद्मना चीरवसनौ प्रचरन्ताविहागतौ॥ ६॥
 
 
अनुवाद
ये दोनों वीर अवश्य ही बालि की आज्ञा से इस दुर्गम वन में घूमते हुए यहाँ आ गए हैं। इन्होंने छलपूर्वक फटे हुए वस्त्र धारण कर लिए हैं, जिससे हम इन्हें पहचान न सकें॥6॥
 
These two brave men have definitely come here wandering in this inaccessible forest on the orders of Vali. They have deceitfully put on torn clothes, so that we cannot recognize them.'॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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