श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 2: सुग्रीव तथा वानरों की आशङ्का, हनुमान्जी द्वारा उसका निवारण तथा सुग्रीव का हनुमान जी को श्रीराम-लक्ष्मण के पास उनका भेद लेने के लिये भेजना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.2.22 
अरयश्च मनुष्येण विज्ञेयाश्छद्मचारिण:।
विश्वस्तानामविश्वस्ताश्छिद्रेषु प्रहरन्त्यपि॥ २२॥
 
 
अनुवाद
‘प्रत्येक प्राणी को विशेष रूप से वेश बदलकर घूमने वाले शत्रुओं को पहचानने का प्रयास करना चाहिए; क्योंकि वे दूसरों का विश्वास तो प्राप्त कर लेते हैं, परन्तु स्वयं किसी पर विश्वास नहीं करते और अवसर पाते ही उन विश्वसनीय व्यक्तियों पर आक्रमण कर देते हैं॥ 22॥
 
‘Every living being must especially try to identify the enemies who move around in disguise; because they gain the trust of others but do not trust anyone themselves and attack those trusted people as soon as they get an opportunity.॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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