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श्लोक 4.19.15-16  |
अथवारुचितं स्थानमिह ते रुचिरानने।
आविशन्ति च दुर्गाणि क्षिप्रमद्यैव वानरा:॥ १५॥
अभार्या: सहभार्याश्च सन्त्यत्र वनचारिण:।
लुब्धेभ्यो विप्रलब्धेभ्यस्तेभ्यो न: सुमहद्भयम्॥ १६॥ |
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| अनुवाद |
| 'या सुमुखी! इस समय तुम्हारा इस नगर में रहना हमें अच्छा नहीं लगता; क्योंकि सुग्रीव का साथ देने वाले वानर शीघ्र ही किष्किन्धा के दुर्गम स्थानों में प्रवेश करेंगे। यहाँ बहुत से वनवासी वानर हैं, जिनमें से कुछ अपनी पत्नियों के साथ हैं और कुछ अपनी पत्नियों से विमुख हैं। उनमें राज्य का लोभ उत्पन्न हो गया है और हम लोगों ने उन्हें पहले ही राज्य के सुखों से वंचित कर दिया है। अतः इस समय हमें उनसे बड़ा भय हो सकता है।'॥15-16॥ |
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| ‘Or Sumukhi! We do not like your staying in this city now; because the monkeys supporting Sugreeva will soon enter the inaccessible places of Kishkinda. There are many forest-dwelling monkeys here, some of whom are with their wives and some are separated from their wives. They have developed a greed for the kingdom and have been deprived of the pleasures of the kingdom by us earlier. Therefore, we may get great fear from them at this time.’॥ 15-16॥ |
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