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श्लोक 4.1.99-100  |
अधिकं शोभते पम्पा विकूजद्भिर्विहंगमै:॥ ९९॥
दीपयन्तीव मे कामं विविधा मुदिता द्विजा:।
श्यामां चन्द्रमुखीं स्मृत्वा प्रियां पद्मनिभेक्षणाम्॥ १००॥ |
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| अनुवाद |
| यह पम्पा पक्षियों के कलरव से अत्यन्त सुशोभित है। ये नाना प्रकार के पक्षी हर्षित होकर सीता के प्रति मेरे प्रेम को जागृत करते हैं; क्योंकि उनकी पुकार सुनकर मुझे अपनी प्रिय सीता का स्मरण हो आता है, जो युवा, कमल-नेत्रों वाली तथा चन्द्रमुख वाली थी।॥ 99-100॥ |
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| ‘This Pampa is greatly adorned by the chirping of birds. These birds of various kinds, immersed in joy, kindle my love for Sita; for on hearing their call I am reminded of my beloved Sita, who was young and had lotus-eyed eyes and was moon-faced.॥ 99-100॥ |
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