श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  4.1.88 
निलीय पुनरुत्पत्य सहसान्यत्र गच्छति।
मधुलुब्धो मधुकर: पम्पातीरद्रुमेष्वसौ॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
फूलों में छिपकर वह ऊपर की ओर उड़ता है और अचानक कहीं और चला जाता है। इस प्रकार मधु-पिपासु भौंरा पम्पा नदी के किनारे वृक्षों पर विचरण कर रहा है। 88।
 
‘After hiding in the flowers it flies upwards and suddenly goes somewhere else. In this manner the honey-hungry bumblebee is roaming about on the trees on the banks of the Pampa river. 88.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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