श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 85-86h
 
 
श्लोक  4.1.85-86h 
पादपात् पादपं गच्छन् शैलाच्छैलं वनाद् वनम्॥ ८५॥
वाति नैकरसास्वादसम्मोदित इवानिल:।
 
 
अनुवाद
'एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष की ओर, एक पर्वत से दूसरे पर्वत की ओर तथा एक वन से दूसरे वन की ओर बहती हुई वायु आनन्द से बह रही है, तथा अनेक स्वादों का आस्वादन कर रही है।
 
‘The wind flowing from one tree to another, from one mountain to another and from one forest to another, is flowing with joy, tasting many flavours. 85 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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