श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  4.1.71 
पद्मकोशपलाशानि द्रष्टुं दृष्टिर्हि मन्यते।
सीताया नेत्रकोशाभ्यां सदृशानीति लक्ष्मण॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
'लक्ष्मण! ये कमल की कलियाँ सीता की आँखों के समान हैं। इसलिए मेरी आँखें इन्हें ही देखना चाहती हैं।'
 
‘Lakshmana! These lotus buds are like Sita's eye sockets. That is why my eyes want to see them only.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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