श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  4.1.68 
अहो कामस्य वामत्वं यो गतामपि दुर्लभाम्।
स्मारयिष्यति कल्याणीं कल्याणतरवादिनीम्॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
अहा! कामदेव कितने कुटिल हैं, जो मुझे बार-बार उस शुभ स्वरूपा सीता का स्मरण करा रहे हैं, जो अन्यत्र गई हुई और अत्यंत दुर्लभ होने पर भी शुभ वचन बोलती हैं॥ 68॥
 
Oh! How devious is Kama, who is repeatedly reminding me of that auspicious Sita who is of the form of auspiciousness and who speaks auspicious words even though she is gone elsewhere and is extremely rare.॥ 68॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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