श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  4.1.67 
पद्मपत्रविशालाक्षीं सततं प्रियपङ्कजाम्।
अपश्यतो मे वैदेहीं जीवितं नाभिरोचते॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
खिले हुए कमलदलों के समान विशाल नेत्रों वाली विदेह राजकुमारी सीता को सदैव कमल प्रिय रहे हैं। मैं उन्हें न देख पाने के कारण जीवित रहना पसंद नहीं करता॥ 67॥
 
Videha princess Sita, who has eyes as large as the blooming lotus petals, has always loved lotuses. I do not like to live because I do not see her.॥ 67॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd