श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  4.1.58 
विक्षिप्तां पवनेनैतामसौ तिलकमञ्जरीम्।
षट्पद: सहसाभ्येति मदोद‍्धूतामिव प्रियाम्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
'भँवरा अचानक तिलक वृक्ष की कलियों पर बैठ गया है, जो हवा से हिल रही हैं। ऐसा लग रहा है मानो कोई प्रेमी अपनी काम-मग्न प्रेमिका से मिल रहा है।' 58
 
‘The bumble bee has suddenly sat on the buds of the Tilak tree which are being shaken by the wind. It looks as if a lover is meeting his beloved who is trembling in the ecstasy of lust. 58.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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