श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  4.1.57 
पश्य लक्ष्मण संनादं वने मदविवर्धनम्।
पुष्पिताग्रेषु वृक्षेषु द्विजानामवकूजताम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण! देखो, वन में जिन वृक्षों की ऊपरी शाखाएँ फूलों से लदी हुई हैं, उन पर पक्षियों का मधुर स्वर एकाकी लोगों को भी आनंदित कर देता है।
 
Lakshmana! Look, the sweet sound of the chirping birds on the trees in the forest whose upper branches are laden with flowers is enough to make the lonely ones ecstatic.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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