श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  4.1.51 
दृढं हि हृदये बुद्धिर्मम सम्परिवर्तते।
नालं वर्तयितुं सीता साध्वी मद्विरहं गता॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
मेरे हृदय में यह विचार दृढ़ होता जा रहा है कि धर्मात्मा सीता मेरे बिना अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकेंगी ॥ 51॥
 
The thought is becoming stronger in my heart that the virtuous Sita will not be able to survive for long without me. ॥ 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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