|
| |
| |
श्लोक 4.1.51  |
दृढं हि हृदये बुद्धिर्मम सम्परिवर्तते।
नालं वर्तयितुं सीता साध्वी मद्विरहं गता॥ ५१॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| मेरे हृदय में यह विचार दृढ़ होता जा रहा है कि धर्मात्मा सीता मेरे बिना अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकेंगी ॥ 51॥ |
| |
| The thought is becoming stronger in my heart that the virtuous Sita will not be able to survive for long without me. ॥ 51॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|