श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  4.1.50 
श्यामा पद्मपलाशाक्षी मृदुभाषा च मे प्रिया।
नूनं वसन्तमासाद्य परित्यक्ष्यति जीवितम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
मेरी प्रिय जानकी, जो अभी-अभी जन्मी है, खिले हुए कमल के पत्ते के समान मनोहर नेत्रों वाली है, मधुर वाणी बोलने वाली है, इस वसन्त ऋतु में आकर अवश्य ही प्राण त्याग देगी।
 
My beloved Janaki, who is newly born and has lovely eyes like the blooming lotus leaf, who speaks sweetly, will certainly give up her life on reaching this spring season.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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