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श्लोक 4.1.5  |
मां तु शोकाभिसंतप्तमाधय: पीडयन्ति वै।
भरतस्य च दु:खेन वैदेह्या हरणेन च॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| परन्तु इस समय मैं भरत के शोक और सीता के अपहरण की चिन्ता से व्याकुल हूँ। मानसिक वेदना मुझे महान् पीड़ा दे रही है॥5॥ |
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| ‘But at this moment I am tormented by the grief of Bharata's sorrow and the worry of Sita's abduction. Mental agony is causing me great pain.॥ 5॥ |
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