श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  4.1.47 
वसन्तो यदि तत्रापि यत्र मे वसति प्रिया।
नूनं परवशा सीता सापि शोचत्यहं यथा॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
यदि मेरी प्रिय सीता जिस स्थान पर रहती हैं, वहाँ भी इसी प्रकार वसन्त ऋतु खिल रही हो, तो उनकी क्या दशा होगी? निश्चय ही वहाँ दासी बनी हुई सीता भी मेरी ही भाँति दुःखी हो रही होगी॥ 47॥
 
If spring is also blossoming in the same manner at the place where my beloved Sita lives, what will be her condition? Surely Sita, who has been enslaved there, must be grieving like me.॥ 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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