श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  4.1.44 
पश्य लक्ष्मण पुष्पाणि निष्फलानि भवन्ति मे।
पुष्पभारसमृद्धानां वनानां शिशिरात्यये॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण! इस वसन्त ऋतु में इन पुष्पों से लदे हुए वनों के ये सभी पुष्प मेरे लिए निष्फल हो रहे हैं। चूँकि मेरी प्रिय सीता यहाँ नहीं हैं, इसलिए ये मेरे किसी काम के नहीं हैं॥ 44॥
 
Lakshmana! In this spring season, all these flowers of these forests laden with flowers are becoming fruitless for me. Since my beloved Sita is not here, they are of no use to me. ॥ 44॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd