श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  4.1.41-42 
मम त्वयं विना वास: पुष्पमासे सुदु:सह:॥ ४१॥
पश्य लक्ष्मण संरागस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि।
यदेषा शिखिनी कामाद् भर्तारमभिवर्तते॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
इस पुष्पों से परिपूर्ण चैत्र मास में सीता के बिना यहाँ रहना मेरे लिए अत्यन्त कठिन है । लक्ष्मण ! देखो तो पशु-जगत में स्थित प्राणियों में भी परस्पर कितना प्रेम है । इस समय यह मोरनी काम-भावना से युक्त होकर अपने स्वामी के समक्ष उपस्थित हुई है ॥41-42॥
 
It is very difficult for me to stay here without Sita in this month of Chaitra which is full of flowers. Lakshman! Just see how much love there is for each other even among the creatures who are in the animal world. At this time this peacock has presented herself before her master with a feeling of lust. ॥ 41-42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)