श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 36-37h
 
 
श्लोक  4.1.36-37h 
अमी मयूरा: शोभन्ते प्रनृत्यन्तस्ततस्तत:॥ ३६॥
स्वै: पक्षै: पवनोद‍्धूतैर्गवाक्षै: स्फाटिकैरिव।
 
 
अनुवाद
ये मोर अपने पंख फैलाकर, जो स्फटिक की खिड़कियों के समान प्रतीत होते हैं और वायु में हिल रहे हैं, इधर-उधर नाचते हुए कितने सुन्दर हैं?॥36 1/2॥
 
‘How beautiful are these peacocks dancing here and there with their spread out wings which appear like windows made of crystal and are vibrating in the wind?॥ 36 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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