श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 29-30h
 
 
श्लोक  4.1.29-30h 
अशोकस्तबकाङ्गार: षट्पदस्वननि:स्वन:॥ २९॥
मां हि पल्लवताम्रार्चिर्वसन्ताग्नि: प्रधक्ष्यति।
 
 
अनुवाद
लगता है बसंत की यह आग मुझे जलाकर राख कर देगी। अशोक के फूलों के लाल गुच्छे इस आग के अंगारे हैं, नए पत्ते इसकी लाल लपटें हैं और मधुमक्खियों का भिनभिनाना इस जलती हुई आग की ध्वनि है।
 
‘It seems that this fire of spring will burn me to ashes. The red bunches of Ashoka flowers are the embers of this fire, the new leaves are its red flames and the buzzing of the bees is the sound of this burning fire.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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