श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  4.1.28-29h 
अस्या: कूले प्रमुदिता: सङ्घश: शकुनास्त्विह।
दात्यूहरतिविक्रन्दै: पुंस्कोकिलरुतैरपि॥ २८॥
स्वनन्ति पादपाश्चेमे ममानङ्गप्रदीपका:।
 
 
अनुवाद
'इस पम्पा नदी के तट पर पक्षियों के झुंड हर्ष से चहचहा रहे हैं। जलपक्षियों के मैथुन-काल की ध्वनि और कोयल की कूक से ऐसा प्रतीत होता है मानो ये वृक्ष स्वयं मधुर वाणी बोल रहे हैं और मेरी गुदा-पीड़ा को जगा रहे हैं।॥28 1/2॥
 
‘Here on the banks of this Pampa river flocks of birds are chirping in joy. With the sound of the mating chirps of water birds and the cuckoos' chirping, it seems as if these trees themselves are speaking sweetly and are arousing my anal pain.॥ 28 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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