श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.1.17 
स एव सुखसंस्पर्शो वाति चन्दनशीतल:।
गन्धमभ्यवहन् पुण्यं श्रमापनयनोऽनिल:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मलयचंदन को स्पर्श करके बहने वाली यह शीतल वायु शरीर को स्पर्श करके कितनी सुखद लगती है। यह थकान दूर करती हुई तथा सर्वत्र पवित्र सुगन्धि फैलाती हुई बह रही है॥17॥
 
‘This cool breeze flowing after touching the Malaychandan feels so pleasant when it touches the body. It is blowing while removing tiredness and spreading sacred fragrance everywhere.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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