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श्लोक 4.1.130  |
तमाश्रमं पुण्यसुखं शरण्यं
सदैव शाखामृगसेवितान्तम्।
त्रस्ताश्च दृष्ट्वा हरयोऽभिजग्मु-
र्महौजसौ राघवलक्ष्मणौ तौ॥ १३०॥ |
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| अनुवाद |
| मतंग मुनि का वह आश्रम अत्यंत पवित्र एवं रमणीय था। ऋषि के शाप के कारण वालि का उसमें प्रवेश कठिन था, इसलिए वह अन्य वानरों का आश्रय स्थल बन गया। उस आश्रम या वन के अन्दर सदैव अनेक मृग रहते थे। उस दिन महाबली श्रीराम और लक्ष्मण को देखकर अन्य वानर भी भयभीत होकर आश्रम के अन्दर चले गए। 130. |
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| That hermitage of Matang Muni was extremely holy and pleasant. Due to the curse of the sage, it was difficult for Vali to enter it, so it became a shelter for other monkeys. Many deer always lived inside that hermitage or forest. On seeing the mighty Shri Ram and Lakshman that day, other monkeys also got frightened and went inside the hermitage. 130. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे प्रथम: सर्ग:॥ १॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥ १॥ |
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