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श्लोक 4.1.122  |
उत्साहवन्त: पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु।
उत्साहमात्रमाश्रित्य प्रतिलप्स्याम जानकीम्॥ १२२॥ |
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| अनुवाद |
| जिनके हृदय में उत्साह है, वे कठिन से कठिन कार्य आने पर भी साहस नहीं छोड़ते। उत्साह का आश्रय लेकर ही हम जनकनन्दिनी को प्राप्त कर सकते हैं॥122॥ |
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| ‘Those who have enthusiasm in their hearts do not lose courage even when faced with the most difficult tasks. We can achieve Janakanandini only by taking recourse to enthusiasm.॥ 122॥ |
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