श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 122
 
 
श्लोक  4.1.122 
उत्साहवन्त: पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु।
उत्साहमात्रमाश्रित्य प्रतिलप्स्याम जानकीम्॥ १२२॥
 
 
अनुवाद
जिनके हृदय में उत्साह है, वे कठिन से कठिन कार्य आने पर भी साहस नहीं छोड़ते। उत्साह का आश्रय लेकर ही हम जनकनन्दिनी को प्राप्त कर सकते हैं॥122॥
 
‘Those who have enthusiasm in their hearts do not lose courage even when faced with the most difficult tasks. We can achieve Janakanandini only by taking recourse to enthusiasm.॥ 122॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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