श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  4.1.116 
स्मृत्वा वियोगजं दु:खं त्यज स्नेहं प्रिये जने।
अतिस्नेहपरिष्वङ्गाद् वर्तिरार्द्रापि दह्यते॥ ११६॥
 
 
अनुवाद
स्वजनों के वियोग का दुःख तो सभी को भोगना ही पड़ता है। ऐसा स्मरण करके अपने स्वजनों के प्रति अत्यधिक ममता (आसक्ति) त्याग दो; क्योंकि जल आदि में भीगी हुई बाती भी अत्यधिक ममता (तेल) में डूबी रहने पर जलने लगती है॥ 116॥
 
Everyone has to suffer the sorrow of the inevitable separation from relatives. Remembering this, give up excessive affection (attachment) towards your near and dear ones; because even a wick soaked in water etc. starts burning when dipped in excessive affection (oil).॥ 116॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)