श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  4.1.111 
प्राप्य दु:खं वने श्यामा मां मन्मथविकर्शितम्।
नष्टदु:खेव हृष्टेव साध्वी साध्वभ्यभाषत॥ १११॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि सोलह वर्ष की आयुवाली पतिव्रता सीता वन में कष्ट सह रही थीं, तथापि जब उन्होंने मुझे दुःख या मानसिक वेदना से पीड़ित देखा, तब वे प्रसन्न हो गईं और मेरे दुःख को दूर करने के लिए मुझसे मधुर बातें करने लगीं, मानो उनके सारे दुःख दूर हो गए हों॥111॥
 
Although the pious Sita, who was about sixteen years old, was suffering in the forest, yet when she saw me suffering from anguish or mental anguish, she became cheerful and started talking nicely to me to alleviate my pain, as if all her own sorrows had vanished.॥ 111॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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