श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  4.1.109 
तच्चार्वाञ्चितपद्माक्षं सुगन्धि शुभमव्रणम्।
अपश्यतो मुखं तस्या: सीदतीव मतिर्मम॥ १०९॥
 
 
अनुवाद
जो कमल के पत्ते के समान सुन्दर है, जिसके नेत्र मनोहर और प्रशंसनीय हैं, जो मधुर सुगन्धि बिखेरती है, जो पवित्र है और जिस पर चेचक आदि के कोई दाग नहीं हैं, उस जनकपुत्री के मनोहर मुख को न देखकर मैं अपनी सुध-बुध खो रहा हूँ॥109॥
 
I am losing my senses without seeing the lovely face of Janaka's daughter who is as beautiful as a lotus leaf, who is adorned with lovely and praiseworthy eyes, who exude a sweet fragrance, who is pure and without any marks of smallpox etc.॥ 109॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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