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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड
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सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना
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श्लोक 105
श्लोक
4.1.105
श्यामा पद्मपलाशाक्षी प्रिया विरहिता मया।
कथं धारयति प्राणान् विवशा जनकात्मजा॥ १०५॥
अनुवाद
हाय! वह युवा, कमल-नेत्र वाली, जनकनन्दी प्रिया सीता मुझसे वियोग होकर ऐसी असहाय अवस्था में कैसे अपने प्राण धारण करेंगी?॥105॥
Alas! How would that young, lotus-eyed, Janakanandini, Priya Sita, hold on to her life in such a helpless state after being separated from me?॥ 105॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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