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श्लोक 4.1.101  |
पश्य सानुषु चित्रेषु मृगीभि: सहितान् मृगान्।
मां पुनर्मृगशावाक्ष्या वैदेह्या विरहीकृतम्।
व्यथयन्तीव मे चित्तं संचरन्तस्ततस्तत:॥ १०१॥ |
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| अनुवाद |
| लक्ष्मण! देखो, ये मृग अपनी मृगियों के साथ पर्वत के विचित्र शिखरों पर विचरण कर रहे हैं और मैं मृगरूपी सीता से विमुख हूँ। ये मृग इधर-उधर विचरण करते हुए मेरे मन को व्याकुल कर रहे हैं॥101॥ |
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| Lakshmana! Look, these deer are roaming around with their female deers on the strange peaks of the mountain and I am separated from doe-eyed Sita. These deer roaming here and there keep troubling my mind.॥ 101॥ |
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